अंतरराष्ट्रीयपर्यटनराष्ट्रीयवीडियोहिमाचल प्रदेश

बैजनाथ शिव मंदिर: इतिहास, आस्था और शिल्प का संगम

भारतीय आध्यात्मिक चेतना, शैव परंपरा और ऐतिहासिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक

धर्मशाला।

हिमालय की धौलाधार पर्वतमाला की गोद में स्थित बैजनाथ केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना, शैव परंपरा और ऐतिहासिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। यह नगर अपने प्राचीन नाम वैद्यनाथ के कारण विशेष धार्मिक महत्व रखता है, जहां भगवान शिव को रोगनाशक, जीवनदाता और करुणामय वैद्य के रूप में पूजा जाता है। बैजनाथ का शिव मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारत की प्राचीन स्थापत्य कला, शिल्प परंपरा और सांस्कृतिक विकास की अमूल्य धरोहर भी है।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बैजनाथ केवल एक धार्मिक स्थान ही नहीं है, बल्कि प्राचीन समय से ही “कीरतों” तथा कटोच राजवंश के शासकों का निवास स्थान भी रहा है। कीरात हिमालय की आदिवासी जाति थी जिसका उल्लेख महाभारत में भी पाया जाता है। कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि कीरात लोगों की राजधानी भी बैजनाथ ही थी। हिमाचल के मानचित्र में इस नगरी की पहचान यहां के प्रसिद्ध, ऐतिहासिक शिव मंदिर के कारण ही है। यह मंदिर उत्तरी भारत का सबसे प्राचीन शिव मंदिर है और अपनी अनूठी वास्तुकला व शिल्पकला के कारण इतिहासकारों व पुरातत्ववेत्ताओं के लिए जिज्ञासा का केंद्र है।

 

उत्तरी भारत के मंदिरों में यह सबसे भिन्न
मंदिर की शिल्पकला के संदर्भ में उल्लेखनीय बात यह है कि उत्तरी भारत के सब मंदिरों में यह सबसे भिन्न है। इस मंदिर का विशाल गुंबद और मंदिर के प्रांगण में स्थित नंदी बैल एक ही विशाल पत्थर को तराश कर बनाए गए हैं, जो तत्कालीन शिल्प के जीवंत उदाहरण है। मंदिर के अंदर शारदा लिपि में अंकित दो शिलालेख भी हैं। मान्यता यह भी है कि इस मंदिर को पांडवों ने अपने वनवास काल के समय बनाया था। पांडवों के इस क्षेत्र में आने और ठहरने के प्रमाण महाभारत के आदिपर्व में मिलते हैं।

बैजनाथ शिव मंदिर की ऐतिहासिक प्राचीनता के सम्बंध में विभिन्न भारतीय एवं विदेशी विद्वानों ने इसके वास्तुशिल्प, मूर्तिकला तथा इसकी भीतरी दीवारों पर लगी शिला- प्रशस्तियों की लिपि एवं भाषा के आधार पर गहन अध्ययन एवं शोध द्वारा अपने अपने ढंग से इस मंदिर की प्राचीनता को ऐतिहासिक वर्षों में बांधने का प्रयास किया है।

लहू से लथपथ था विशाल शिवलिंग
एक किंवदंती के अनुसार एक स्थानीय कृषक अपने खेत में हल चला रहा था। उसे ऐसा अनुभव हुआ कि हल की फाल की नोक किसी वस्तु से टकराई है। कृषक ने हल को भूमि से खींच कर देखा तो दंग रह गया। हल की फाल में रक्त लगा था। उसने धीरे-धीरे वहां से मिट्टी हटानी शुरू की तो भूमि के नीचे उसे एक विशाल शिवलिंग दिखाई दिया, जो लहू से लथपथ था। किसान ने उस शिवलिंग को उठाने का प्रयत्न किया परंतु अधिक भारी होने के कारण वह उसे उठा न पाया तो अपने घर और गांव वालों को बुला कर उनकी सहायता से उस शिवलिंग को भूमि से निकाल कर मेंढ पर रख दिया। सभी लोग उक्त शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने लगे। धीरे-धीरे वर्षों, दशाब्दियों और शताब्दियों तक उस देहरी पर उत्तरोत्तर बड़े से बड़े मंदिर का निर्माण होता रहा, जिस का अंतिम रूप वर्तमान में विद्यामान है।

शिवजी ने रावण का हाथ पकड़ लिया
एक मान्यता के अनुसार त्रेता युग में लंका के राजा रावण ने कैलाश पर्वत पर शिव की घोर तपस्या की। अंत में उसने अपना एक-एक सिर काटकर हवन कुंड में आहुति देकर शिव को अर्पित करना शुरू किया। दसवां और अंतिम सिर कट जाने से पहले शिवजी ने प्रसन्न हो प्रकट होकर रावण का हाथ पकड़ लिया। उसके सभी सिरों को पुर्नस्थापित कर शिव ने रावण को वर मांगने को कहा। रावण ने कहा मैं आपके शिवलिंग स्वरूप को लंका में स्थापित करना चाहता हूं।

हवण कुंड के अवशेष आज भी मौजूद
शिवजी ने तथास्तु कहा और लुप्त हो गए। लुप्त होने से पहले शिव ने अपने शिवलिंग स्वरूप चिह्न रावण को देने से पहले कहा कि इसे जमीन पर न रखना। रावण शिवलिंग लेकर लंका को चले। रास्ते में बैजनाथ में पहुंचने पर रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ। रावण ने “बैजु” नाम के एक ग्वाले को सब बात समझाकर शिवलिंग पकड़ा दिया और शंका निवारण के लिए चला गया। शिवजी की माया के कारण बैजु शिवलिंग के भार को अधिक देर तक न सह सका और उसे धरती पर रखकर अपने पशु चराने चला गया। इस तरह शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। मान्यता है कि बैजनाथ का नामकरण लंका नरेश रावण ने किया था। बैजनाथ शिव मंदिर के पास रावण के हवण कुंड के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

रावण का पद चिह्न
वर्तमान में मंदिर में स्थित शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है, जिसे ऐतिहासिक वर्षों में नहीं बांधा जा सकता। और जहां तक रावण की शिव तपस्या का सम्बंध है, मंदिर के पिछले भाग को अब भी रावण खोला कहा जाता हैै। बैजनाथ के पश्चिम में बिनवा नदी के पुल की ओर उतरते हुए मार्ग के साथ ही एक चिह्न को रावण का पद चिह्न कहा जाता है।

मंदिर के निकट हर वर्ष लगने वाला शिवरात्रि मेला अनूठी शान व गरिमा लिए होता है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पारम्परिक राज्य स्तरीय शिवरात्रि मेला 15 फरवरी से 19 फरवरी, 2026 तक बैजनाथ में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। दूरदराज से सैंकड़ों श्रद्धालु एवं पर्यटक इस मेले दौरान बैजनाथ की मनोरम घाटी में उमड़ते हैं और यहां की रौनक देखते ही बनती है।

बैजनाथ कैसे पहुंचे
सड़क मार्ग: बैजनाथ से धर्मशाला (लगभग 50 किमी) और पालमपुर (16 किमी) से नियमित बस या टैक्सी द्वारा जुड़ा है।
रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन बैजनाथ पपरोला है, जो कांगड़ा घाटी रेलमार्ग पर स्थित है।
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा कांगड़ा एयरपोर्ट (लगभग 60 किमी) दूर है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!