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स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को लेकर हिमाचल की इस बेटी ने की चर्चा

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री नड्डा से मिली ‘राष्ट्रीय पुरस्कार 2025’ से सम्मानित डॉ. श्रुति मोरे भारद्वाज

दिल्ली।

सम्फिया फ़ाउंडेशन कुल्लू की संस्थापक डॉ. श्रुति मोरे भारद्वाज को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दिव्यांगजनों के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय पुरस्कार 2025’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान पूरे देश से आए 2423 आवेदनों में से चुने गए केवल 32 असाधारण व्यक्तियों को दिया गया।

डॉ. श्रुति ने एक नया इतिहास रचते हुए देश की दूसरी ऐसी ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट (Occupational Therapist) होने का गौरव प्राप्त किया है, जिन्हें इस राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद डॉ. श्रुति ने भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा और उनकी पत्नी, प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता स्पेशल ओलम्पिक भारत और चेतना संस्था की संस्थापक मल्लिका नड्डा से मुलाकात की। इस बैठक में देश और विशेषकर हिमाचल प्रदेश में पुनर्वास और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर चर्चा हुई।

ऑक्यूपेशनल थेरेपी कोर्स की आवश्यकता
डॉ. श्रुति ने मंत्री नड्डा को बताया कि देश में प्रशिक्षित ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स की भारी कमी है। हिमाचल और पूरे भारत में ऑक्यूपेशनल थेरेपी से संबंधित नए शैक्षणिक कोर्स शुरू करने और मौजूदा ढाँचे को विस्तृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि युवाओं को रोजगार मिले और मरीजों को बेहतर इलाज।
शीघ्र हस्तक्षेप पर जोर: चर्चा के दौरान ‘अर्ली इंटरवेंशन’ को बढ़ावा देने पर भी बात हुई। डॉ. श्रुति ने सुझाव दिया कि बच्चों में विकासात्मक देरी की जल्द से जल्द पहचान करने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस नीतियां बनाई जानी चाहिए। हिमाचल में कुल्लू की तरह हर जिले DEIC पूरी तरह से एक़ुइप्ट और फंक्शनल होने चाहिए। AIMS बिलासपुर और IGMC में ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के पद को सृजन कर शीघ्र अति शीघ्र भरा जाना चाहिए।

डॉ. श्रुति मोरे भारद्वाज :
“राष्ट्रपति के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि पूरे ऑक्यूपेशनल थेरेपी जगत के लिए गर्व की बात है। स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और मल्लिका नड्डा के साथ हुई चर्चा अत्यंत सकारात्मक रही। हमारा साझा सपना है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों और पूरे देश के हर बच्चे को समय पर और विश्वस्तरीय थेरेपी की सुविधा मिल सके। शीघ्र ही इस विषय पर वह प्रदेश और केन्द्र सरकार को लिखेंगी और जो भी सहयोग होगा, उनकी तरफ से हो पाएगा वह करेंगी।

ऑक्यूपेशनल थेरेपी क्या है
सरल शब्दों में कहें तो, यह लोगों को “आत्मनिर्भर” बनाने का विज्ञान है। इसका उद्देश्य उन लोगों की मदद करना है जो शारीरिक, मानसिक या विकासात्मक बाधाओं के कारण अपने रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई महसूस करते हैं। यहां ‘Occupational’ का अर्थ सिर्फ नौकरी या व्यवसाय नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है वे सभी कार्य जो हम अपना समय बिताने और जीवन जीने के लिए करते हैं।

1. ऑक्यूपेशनल थेरेपी का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य लक्ष्य व्यक्ति को स्वतंत्र बनाना है ताकि वह समाज में सामान्य जीवन जी सके।
दैनिक कार्य: जैसे ब्रश करना, कपड़े पहनना, नहाना, खाना खाना।
उत्पादक कार्य: स्कूल जाना, नौकरी करना, घर का काम करना।
मनोरंजन: खेल खेलना, पेंटिंग करना, या सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना।

2. यह किन लोगों के लिए जरूरी है?

ऑक्यूपेशनल थेरेपी हर उम्र के लोगों के लिए हो सकती है:
बच्चों के लिए
जिन बच्चों को ऑटिज्म, ADHD या सेरेब्रल पाल्सी है।
जिन बच्चों को लिखने में दिक्कत है (Fine Motor Skills की कमी) या जो बटन नहीं लगा पाते, जूतों के फीते नहीं बांध पाते।
जिनका विकास देर से हो रहा है।
उदाहरण के लिए एक थेरेपिस्ट बच्चे को खेल-खेल में पेंसिल पकड़ना या ब्लॉक्स जोड़ना सिखाता है ताकि उसकी उंगलियों की पकड़ मजबूत हो।
वयस्कों और बुजुर्गों के लिए:
जिन्हें लकवा (Stroke) या ब्रेन इंजरी हुई हो।
हादसे के बाद पुनर्वास की जरूरत हो।
गठिया (Arthritis) या बुढ़ापे के कारण हाथ-पैर हिलाने में दिक्कत हो।

3. यह फिजियोथेरेपी (Physiotherapy) से कैसे अलग है?

अक्सर लोग दोनों को एक ही समझते हैं, लेकिन इनमें अंतर है:
फिजियोथेरेपी: इसका फोकस मुख्य रूप से शरीर की कार्यक्षमता पर होता है। जैसे मांसपेशियों की ताकत बढ़ाना, दर्द कम करना, और चलना-फिरना सिखाना।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी: इसका फोकस कार्य करने की क्षमता पर होता है। जैसे हाथ में ताकत आ गई (PT का काम), अब उस ताकत का इस्तेमाल करके चम्मच से खाना कैसे खाना है या शर्ट का बटन कैसे लगाना है, यह OT सिखाता है।

4. एक ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट क्या करता है?

वह मरीज के घर या स्कूल के वातावरण में बदलाव करता है (जैसे व्हीलचेयर के लिए रैंप बनवाना या विशेष प्रकार के चम्मच/ पेन का सुझाव देना)।
वह मरीज को नए तरीके सिखाता है ताकि कमजोरी के बावजूद काम पूरा हो सके।
वह संवेदी एकीकरण पर काम करता है (विशेषकर बच्चों में)।

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