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इस राज्य में खेतिहर विरासत को नई दिशा दे रही सरकार की यह पहल, आप भी जानें

परंपरागत खेती से आधुनिकता की ओर बढ़ता किसान

धर्मशाला

आज हम जिस राज्य की बात कर रहे हैं वह प्राकृतिक सुंदरता, जलवायु और पहाड़ी भूगोल के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, लेकिन इसी भूगोल ने यहां की कृषि को चुनौतीपूर्ण भी बनाया है। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की। यहां के छोटे खेत, बिखरी जोतें, सिंचाई के सीमित संसाधन और मौसम की अनिश्चितता हमेशा किसानों के सामने बड़ी बाधाएं रही हैं। ऐसी स्थिति में हिमाचल सरकार की ‘हिम कृषि योजना’ प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में एक नई उम्मीद, नई ऊर्जा का संचार करती है।

प्रदेश सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना किसानों को पारंपरिक खेती की सीमाओं से आगे ले जाकर उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों, उच्च क्षमता वाली फसलों और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से जोड़ने का प्रयास है। यह न सिर्फ कृषि उत्पादकता बढ़ाने की पहल है बल्कि किसानों के जीवन स्तर को उन्नत बनाने की दिशा में भी एक ठोस कदम है।

हिमाचल की कृषि मुख्यतः मानसूनी बारिश पर निर्भर रही है। असमान सिंचाई व्यवस्था और सीमित तकनीकी संसाधनों के कारण किसान अपनी भूमि की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते। इसके अलावा सब्जियों, फलोत्पादन और फूलों की भारी संभावनाएं होने के बावजूद उचित प्रशिक्षण व उपकरणों के अभाव में किसान लाभ से वंचित रह जाते थे। इन्हीं चुनौतियों को दूर करने के उद्देश्य से हिमाचल सरकार द्वारा हिम कृषि योजना शुरू की गई, जो कृषि क्षेत्र की व्यापक जरूरतों को समझते हुए बनाई गई एक बहुआयामी योजना है। योजना के तहत पहाड़ी खेतों के लिए उपयुक्त लघु कृषि यंत्रों से लेकर उन्नत मशीनरी तक, किसानों को 30 से 80 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। इससे खेती ना केवल आसान हुई है बल्कि इसकी लागत भी काफी कम हुई है।

पहाड़ों में मौसम की अनिश्चितता सबसे बड़ी चुनौती है। पाॅलीहाउस के साथ ही ड्रिप व स्प्रिंकलर प्रणाली किसानों के लिए गेम चेंजर साबित हो रही हैं। इन संरचनाओं में ऑफ सीजन सब्जियों का उत्पादन, बीज उत्पादन जैसी गतिविधियां बड़े स्तर पर संभव हो रही हैं। हिमाचल में पानी की उपलब्धता जितनी चुनौती है, उतनी ही कुशल सिंचाई की जरूरत भी। ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली पर सहायता देकर सरकार ने जल प्रबंधन को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। अब कम पानी में अधिक उत्पादन एक सच्चाई बन चुका है।

किसानों की आय में कई गुना बढ़ोतरी
हिम कृषि योजना की सबसे बड़ी सफलता यह है कि किसानों में आत्मविश्वास बढ़ा है। जहां पहले पहाड़ी खेतों को कम उत्पादक माना जाता था, वहीं अब पाॅलीहाउस में उगती खीरा, शिमला मिर्च, टमाटर की आधुनिक किस्मों की व्यावसायिक खेती, सब्जियां के उत्पादन से किसानों की आय कई गुना बढ़ा रही हैं। यह योजना केवल किसानों तक सीमित नहीं है। कृषि उत्पादन बढ़ने सेकृ स्थानीय मंडियों में गतिविधियां बढ़ी हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

गांवों में महिलाओं की भूमिका मजबूत
हिम कृषि योजना ने गांवों में महिलाओं की भूमिका को भी मजबूत किया है। यह योजना किसान को उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक से उद्यमी बनाने की प्रक्रिया है। प्रदेश की कृषि को आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच और सतत विकास की दिशा में ले जाने में यह योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

हेमराज बैरवा, उपायुक्त कांगड़ा

ग्रामीण अर्थव्यवस्था हो रही सुदृढ़: उपायुक्त
उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा का कहना है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सोच है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया जाए। इसी दृष्टि के तहत प्रदेश में मुख्यमंत्री हिम कृषि योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत लगभग 80 कनाल भूमि वाले क्लस्टरों की पहचान की जाती है, जहां कृषि का आधुनिकीकरण सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं और प्रशिक्षण उपलब्ध करवाए जाते हैं। किसानों की क्षमता-वृद्धि, कौशल विकास एवं आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण निरंतर इन क्लस्टरों में आयोजित किया जाता है।

उन्होंने बताया कि इस योजना से लाभान्वित किसानों की वार्षिक आय लगभग ढाई से तीन लाख रुपए तक पहुंच रही है। उदाहरणस्वरूप, यदि किसान इन क्लस्टरों में हल्दी की खेती करते हैं, तो सरकार ने 90 रुपए प्रति किलो की दर से एमएसपी पर खरीद का वादा किया है। एक कनाल से औसतन पांच क्विंटल तक हल्दी उत्पादन हो जाता है, जिससे लगभग 45 हजार रुपए प्रति कनाल की आमदनी प्राप्त होती है।

इसके विपरीत, यदि किसान पारंपरिक रूप से गेहूं या मक्का जैसी फसलें उगाते हैं जहां रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का उपयोग होता है तो उनकी आय केवल 4 से 5 हजार रुपए प्रति कनाल ही रहती है। वहीं, यदि किसान गोबर आधारित प्राकृतिक खेती अपनाएँ और मक्का या गेहूं उगाएं, तो उनकी आय दोगुनी से भी अधिक हो सकती है। हल्दी जैसी फसलों से तो यह आय चार से दस गुना तक बढ़ जाती है।

उपायुक्त ने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार लाना, किसानों की आय बढ़ाना और उन्हें ऐसे कार्यों से जोड़ना जो समाज एवं अर्थव्यवस्था दोनों के लिए सकारात्मक योगदान देते होंकृ इन्हीं उद्देश्यों को लेकर हिम कृषि योजना प्रभावी भूमिका निभा रही है। उन्होंने अन्य किसानों से भी आग्रह किया कि वे इस योजना का अधिक से अधिक लाभ उठाएँ और अपनी आय को सुदृढ़ बनाएं।

कुलदीप धीमान, उप निदेशक कृषि।

37 क्लस्टरों में मिल रहा हिम कृषि योजना का लाभ: कुलदीप धीमान
उप निदेशक कृषि कुलदीप धीमान कहते हैं कि हिमाचल सरकार द्वारा वर्ष 2024-2025 से हिम कृषि नाम से एक योजना चलाई जा रही है। इस योजना का उद्देश्य यह था कि प्रत्येक विकास खंड में 2 से 3 क्लस्टर चुने जाएं। चयनित क्लस्टरों में शामिल किसानों को उनका फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक कृषि सामग्री जैसे बीज, खाद या अन्य जरूरत की वस्तुएं उपलब्ध करवाई जाएं, ताकि किसान अपना उत्पादन बढ़ा सकें और कृषि में अपना रोजगार स्थापित कर सकें। यही इस योजना का प्रमुख लक्ष्य था। इस योजना के अंतर्गत जिला कांगड़ा में 37 क्लस्टरों का चयन किया गया है, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 1770 बीघा है। इन क्लस्टरों के अंतर्गत लगभग 1451 परिवार इस योजना से लाभान्वित होंगे।

पिछले वर्ष और इस वर्ष इस योजना के अंतर्गत की गई प्रमुख गतिविधियों में किसानों को सूक्ष्म सिंचाई योजनाएं उपलब्ध कराना और उन पर अनुदान देना शामिल है। इसके अलावा किसानों को पाॅलीटनेल दिए गए हैं, ताकि वे नर्सरी तैयार कर अच्छी आमदनी कमा सकें। किसानों को हल्दी का बीज भी उपलब्ध कराया गया है, ताकि वे सरकार की हल्दी खरीद योजना का लाभ उठा सकें।

कुलदीप धीमान कहते हैं कि किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए उत्साहित किया जाता है, किसानों को वर्मी कम्पोस्ट के लिए भी अनुदान दिया जाता है और किसान अपने उत्पादन की अचार, चटनी इत्यादि बनाकर कैसे बाजार में विक्रय कर सकें इसके लिए भी किसानों की मदद की जाती है।

धर्मशाला के समीपवर्ती गांव डिक्टू झियोल की किसान अनिता कुमारी पॉलीहाउस में सब्जियों की देखभाल करती हुईं।

हिम कृषि योजना के लाभार्थी क्या कहते हैं
धर्मशाला के समीप गांव डिक्टू झियोल की किसान अनिता कुमारी कहती हैं कि हमारे गांव में कृषि विभाग की ओर से हमें 8 पाॅलीहाउस लगाए गए थे। इसके बाद हिम कृषि योजना के अंतर्गत हमें मार्गदर्शन मिला कि इनमें विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जा सकती हैं। शुरुआत में हमने शिमला मिर्च लगाई और उसके बाद खीरा उगाना शुरू किया। वर्तमान में हमारे 8 पाॅलीहाउस चल रहे हैं और 8 और लगाए जाने हैं, इन पाॅलीहाउसों में ताइवान कंपनी के हीरो स्टार और हिम स्टार किस्म के खीरे लगाए गए हैं। एक पॉलीहाउस में लगभग 550 पौधे लगाए जाते हैं। मिट्टी तैयार करने के लिए हम इसमें देसी खाद, नीम केक, एमपी, कैल्शियम आदि डालते हैं।

इन 8 पाॅलीहाउसों से हमें 10 से 12 टन उत्पादन मिलता है, और यदि फसल बहुत अच्छी हो जाए तो 20 टन तक भी निकल आता है। खीरा हम सब्जी मंडी, कांगड़ा तथा कुछ होटलों से संपर्क कर वहीं बेचते हैं। जहाँ पाॅलीहाउस नहीं लगाए जा सके, वहाँ हमने खुले में गोभी लगाई है। इसमें कुछ पौधे कृषि विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए और कुछ हमने स्वयं लगाए हैं। मेरे गांव के 28 किसान परिवार मेरे साथ जुड़े हुए हैं और सभी खेती कर रहे हैं। उन्हें भी कृषि विभाग और हिम कृषि योजना के तहत समय-समय पर प्रशिक्षण तथा बीज आदि उपलब्ध कराए जाते हैं। पूरे खर्च निकालने के बाद हम दो टर्म में लगभग ढाई लाख रुपए का लाभ कमा लेते हैं। फसल अच्छी होने पर 2.5 से 3 लाख रुपए तक की आय हो जाती है। खीरे के बीज पर लगभग 10 हजार रुपए का खर्च आता है। इसके अलावा खाद, दवाइयों आदि पर भी खर्च होता है। इन सभी खर्चों के बाद कुल मिलाकर ढाई लाख रुपए के लगभग आय हो जाती है।

इस योजना के तहत धर्मशाला के समीप गांव डिक्टू की किसान उषा देवी, विन्ता देवी, कमलेश और मनोहर सिंह कहते हैं कि उनके गांव में हिम कृषि क्लस्टर होने के कारण उन्हें अपने घर द्वार के समीप ही रोजगार मिला है और उनकी आर्थिकी भी सृदृढ़ हुई है वह इस योजना के लिए हिमाचल सरकार का धन्यवाद करते हैं।

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