डॉ. पाठक ने पूर्वोत्तर की पहचान को हिमाचल की मिट्टी से जोड़कर पेश की नई मिसाल
अब 1 हजार वर्गफीट क्षेत्र में खेती से 25 से 30 लाख तक सालाना आय का रखा टारगेट
पालमपुर (कांगड़ा)।
हिमाचल प्रदेश की सुरम्य वादियों में बागवानी मात्र फलों के उत्पादन तक सीमित होकर नहीं रह गई है, बल्कि फूलों की खुशबू भी स्वरोजगार के नए द्वार खोल रही है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार उद्यान विभाग की पुष्प क्रांति सहित विभिन्न योजनाएं बागवानों के सपनों को पंख दे रही है। विभाग के तकनीकी सहयोग और उदार अनुदान ने प्रदेश के लोग पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर ‘फ्लोरीकल्चर’ (पुष्पखेती) में पहचान बनाने का साहस प्रदान किया है। इसी दूरदृष्टि का जीवंत उदाहरण हैं डॉ. नरेंद्र पाठक।

ऊना जिले के कुटलैहड़ के रहने वाले डॉ. नरेंद्र पाठक ने फ्लोरीकल्चर में पीएचडी की है। उनकी शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने मिट्टी से जुड़कर कुछ नया करने की ठानी। अपने जुनून को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने पालमपुर के राख क्षेत्र में जमीन लीज पर लेकर पॉलीहाउस स्थापित कर फूलों की खेती शुरु की। डॉ. नरेंद्र का उद्देश्य स्पष्ट था, उन फूलों को हिमाचल की आबोहवा में ढालना, जो मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत की पहचान माने जाते हैं।
सिंबिडियम ऑर्किड को अपनी खूबसूरती और लंबे जीवन काल के लिए जाना जाता है। एक बार गमले से तोड़ने के बाद फूल 5 से 7 स्पताह तक तरोताजा रहता है। शादी सहित अन्य समारोहों और होटल उद्योग में इन फूलों की अच्छी खासी मांग है। यूं तो यह हिमालयी क्षेत्र का फूल है लेकिन अमूमन भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ही फलता-फूलता और उगाया जाता है। डॉ. नरेंद्र ने इस चुनौती को स्वीकार किया और इसके कंद (बीज) नॉर्थ-ईस्ट से लेकर आए। आज पालमपुर के राख में उनके तीन अत्याधुनिक पॉलीहाउस में सिंबिडियम के फूलों की 50 से ज्यादा रंग विरंगी प्रजातियां लहलहा रही है। लगभग 1000 स्क्वायर फीट में फैली यह खेती न केवल डॉ. नरेंद्र की मेहनत का परिणाम है, बल्कि उत्तर भारत में विविधतापूर्ण बागवानी का एक नया और अनूठा मॉडल भी है।

विभाग ने दिया करीब 18.50 लाख का अनुदान
किसी भी बड़े सपने को धरातल पर उतारने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। डॉ. नरेंद्र के इस प्रोजेक्ट में हिमाचल प्रदेश बागवानी विभाग उनके साथ एक मजबूत स्तंभ बनकर खड़ा हुआ। विभाग द्वारा उन्हें पुष्प क्रांति योजना और अन्य योजनाओं की विभिन्न मदों में लगभग 18.50 लाख रुपए की सब्सिडी प्रदान की गई। उन्होंने इस सफलता के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू और बागवानी विभाग के अधिकारियों का आभार जताया है, जिनके सहयोग से यह राह आसान हुई। डॉ. नरेंद्र अब इसका कंद (बीज) स्वंय तैयार भी कर रहे हैं।
सिंबिडियम फूल की खेती धैर्य का काम
डॉ. नरेंद्र बताते हैं…
* रोपण के करीब तीन साल बाद यह पौधा रिटर्न देना शुरू करता है।
* 5 से 6 साल में यह आय का एक बेहतरीन और स्थिर जरिया बन जाता है।
* एक बार पौधा परिपक्व हो जाए, तो अगले कई वर्षों तक सालों तक यह वार्षिक आय सुनिश्चित करता है
– डॉ. नरेंद्र को 1 हजार वर्गफीट से आने वाले समय में 25 से 30 लाख सालाना आय की उम्मीद
-1 हजार वर्गफीट से साल बाद 8 लाख रुपए की आय सुनिश्चित हो जाती है
वर्तमान में, बाजार में इसकी भारी मांग को देखते हुए सिंबिडियम की एक स्टिक करीब 500 रुपए तक बिकती है, जबकि पूरा गमला 1500 से 2000 रुपए तक की कीमत प्राप्त करता है। मुख्य रूप से दिल्ली जैसे मेट्रोपॉलिटन शहरों में इन फूलों की भारी मांग है, जहाँ इन्हें बड़े पैमाने पर डॉ. नरेंद्र द्वारा भेजा जा रहा है।

इनका कहना है
भविष्य की राह और अन्य बागवानों के लिए संदेश-
डॉ. नरेंद्र केवल खुद की प्रगति तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे अन्य युवाओं और बागवानों को भी सिंबिडियम की खेती के गुर सिखाने के लिए तैयार हैं। उनका मानना है कि यदि सही तकनीक और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाया जाए, तो हिमाचल का हर युवा आत्मनिर्भर बन सकता है।
– डॉ. नरेंद्र पाठक, पीएचडी इन फ्लोरीकल्चर एवं प्रगतीशील बागवान
सिंबिडियम की खेती स्वरोजगार के द्वार खोलती है और यदि कोई बागवान इस आधुनिक खेती को शुरू करना चाहता है, तो वह कांगड़ा जिले के बागवानी विभाग में संपर्क कर सकता है।
डॉ. सरिता शर्मा, विषय विशेषज्ञ उद्यान पालमपुर
विभाग पुष्पखेती के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत बागवानों की सहायता के लिए तत्पर है। डॉ. नरेंद्र पाठक ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है।
डॉ. अलक्ष पठानिया, उप निदेशक उद्यान जिला कांगड़ा
जिला कांगड़ा के विकास खंड रैत, धर्मशाला, बैजनाथ व भवारना के ठंडे ऊंचाई वाले क्षेत्र इस फूल की खेती के लिए उपयुक्त हैं। इसलिए बेरोजगार युवा सिंबिडयम की खेती को स्वरोजगार के तौर पर अपना सकते हैं।
डॉ. कमलशील नेगी, संयुक्त निदेशक बागवानी विभाग धर्मशाला



