67वां विद्रोह दिवस: सड़कों पर उतरे हजारों तिब्बती
'तिब्बत आज़ाद और स्वतंत्र नहीं हो जाता, अपनी आवाज उठाते रहेंगे'
धर्मशाला।
10 मार्च 1959 यह वह तारीख है जब हजारों की संख्या में तिब्बती तिब्बत की राजधानी ल्हासा की सड़कों पर उतर आए। वजह थी तिब्बत पर गैर कानूनी हमले और कब्जे के खिलाफ आवाज बुलंद करना। दलाई लामा की सुरक्षा और तिब्बत के भविष्य की रक्षा के लिए दलाई लामा के घर पोताला पैलेस को घेर लिया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तिब्बती लोगों के इस तरह सड़कों पर उतरने और आवाज उठाने पर चीनी सैनिकों ने गोलियां चलाई तो हजारों की संख्या में लोग मारे गए। बावजूद इसके तिब्बतियों ने सरेंडर करने से मना कर दिया।
यही कारण 10 मार्च दुनिया भर में फैले पुराने और आज के तिब्बतियों के दिल में आज भी जिन्दा है। तिब्बत के इतिहास में ऐसी और कोई दूसरी घटना नहीं है जिसने तिब्बतियों की ज़िंदगी को इतने करीब से छुआ।
66 साल बाद भी, तिब्बती अपने नेता और अपने देश को चीन के राज से बचाने के लिए उसी लगन और जुनून से भरे हुए हैं। तिब्बती आज भी आज़ादी और सिर्फ़ तिब्बती होने की आज़ादी मांग रहे हैं – अपनी भाषा बोलने की, अपने बौद्ध धर्म को मानने की और अपने देश में आज़ादी से रहने की।
तिब्बत की आज़ादी के आंदोलन में आज नई पीढ़ी सबसे आगे है। 10 मार्च को, तिब्बती नेशनल अपराइजिंग डे की सालगिरह पर सभी तिब्बती एकजुट होकर उसी जोश से तिब्बत की आज़ादी और स्वतंत्रता के संघर्ष में दिखाई देते हैं।
तिब्बती लोगों का कहना है वे आज, कल और जब तक तिब्बत आज़ाद और स्वतंत्र नहीं हो जाता, अपनी आवाज उठाते रहेंगे।



