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सत्ता का दुरुपयोग कर बांटी गई ‘रेवड़ियां’ अब वापस ली जा रही : परमार

कहा, अब नहीं चलेगा बहाना मुख्यमंत्री दें आर्थिक बदहाली का हिसाब

धर्मशाला।

हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार द्वारा आज मंगलवार को लिया गया निर्णय न केवल देर से लिया गया कदम है, बल्कि यह इस बात का भी स्पष्ट प्रमाण है कि प्रदेश की आर्थिक बदहाली के लिए सीधे तौर पर स्वयं मुख्यमंत्री और उनकी कार्यप्रणाली जिम्मेदार है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस फैसले को सरकार आज मजबूरी में ले रही है, उसे बहुत पहले ही जनहित में लागू किया जाना चाहिए था। यह कहना है भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं सुलह विधानसभा क्षेत्र से विधायक विपिन सिंह परमार का।

विपिन सिंह परमार ने कहा कि प्रदेश की जनता भली-भांति जानती है कि बीते समय में किस प्रकार सत्ता का दुरुपयोग करते हुए कैबिनेट रैंक और अन्य लाभकारी पद “रेवड़ियों” की तरह बांटे गए। यह सब केवल अपने चहेते मित्रों और समर्थकों को खुश करने के लिए किया गया। शासन का यह गैर-जिम्मेदाराना रवैया ही आज हिमाचल प्रदेश को आर्थिक गर्त में धकेलने का मुख्य कारण बना है।

विपिन सिंह परमार ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता प्रदेश का विकास नहीं, बल्कि अपने करीबी लोगों को लाभ पहुंचाना रही। जिस प्रकार से बिना किसी ठोस आवश्यकता के कैबिनेट रैंक प्रदान किए गए, उससे सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ा। आज जब वित्तीय स्थिति चरमरा चुकी है, तब जाकर सरकार को अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है – लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी है।

परमार ने कहा कि यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रदेश के हितों को दरकिनार कर किसके दबाव में या किस स्वार्थ के चलते यह फैसले लिए गए? क्या मुख्यमंत्री को उस समय प्रदेश की आर्थिक स्थिति का अंदाजा नहीं था, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं? यदि ऐसा है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि जनता के विश्वास के साथ खुला धोखा है।

विपिन सिंह परमार ने कहा कि आज सरकार द्वारा कुछ कैबिनेट रैंक वापस लेने का निर्णय केवल एक दिखावटी कदम प्रतीत होता है। यह आधा-अधूरा प्रयास है, जिससे न तो प्रदेश की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और न ही जनता का भरोसा लौटेगा। जब तक उन सभी सुख-सुविधाओं और विशेषाधिकारों को तत्काल प्रभाव से समाप्त नहीं किया जाता, जो इन पदों के साथ दिए गए थे, तब तक यह कदम निरर्थक ही रहेगा।

परमार ने कहा कि प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि जिन लोगों को अब तक सरकारी खर्चे पर सुविधाएं दी जा रही थीं – गाड़ियां, स्टाफ, आवास और अन्य लाभ उनका खर्च आखिर किसके पैसे से चल रहा था? यह स्पष्ट है कि यह सब जनता की गाढ़ी कमाई से ही हो रहा था। ऐसे में सरकार की जवाबदेही और भी बढ़ जाती है। मुख्यमंत्री ने अपने पद की गरिमा और जिम्मेदारी को नजरअंदाज करते हुए निजी संबंधों को प्राथमिकता दी। शासन चलाने का यह तरीका न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। आज हिमाचल प्रदेश जिस आर्थिक संकट से गुजर रहा है, उसकी जड़ में यही कुप्रबंधन और गलत नीतियां हैं।

विपिन सिंह परमार ने कहा कि अब केवल प्रतीकात्मक निर्णयों से काम नहीं चलेगा। मुख्यमंत्री को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी और यह बताना होगा कि प्रदेश को इस स्थिति तक पहुंचाने के लिए कौन जिम्मेदार है। साथ ही, उन सभी फैसलों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, जिनके कारण प्रदेश की आर्थिक स्थिति बिगड़ी।

विपिन सिंह परमार ने कहा कि प्रदेश सरकार को तुरंत प्रभाव से सभी अनावश्यक खर्चों पर रोक लगानी चाहिए, अपने चहेते लोगों को दी जा रही सभी सुविधाएं वापस लेनी चाहिए और एक पारदर्शी वित्तीय नीति अपनानी चाहिए। अन्यथा, आने वाले समय में प्रदेश की जनता इस कुप्रबंधन का जवाब लोकतांत्रिक तरीके से जरूर देगी। परमार ने कहा कि हिमाचल की जनता अब जागरूक है और वह यह सब चुपचाप सहन करने वाली नहीं है। सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि सत्ता सेवा के लिए होती है, स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं। यदि सरकार ने अब भी अपनी कार्यशैली नहीं बदली, तो जनता स्वयं इसका कठोर उत्तर देने के लिए तैयार है।

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