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धर्मशाला में 4 अप्रैल से अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, देश-विदेश के वैज्ञानिक और एक्सपर्ट लेंगे भाग

'1905 के कांगड़ा भूकंप से लेकर आज तक-टेक्टोनिक्स, स्थिरता और लचीलापन' विषय पर होगा मंथन

अनिकेत सोनी/ धर्मशाला

हिमालयी क्षितिज पर 4 अप्रैल से 7 अप्रैल तक हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा अंतर्गत धर्मशाला में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस सम्मेलन का विषय है 1905 के कांगड़ा भूकंप से लेकर आज तक – टेक्टोनिक्स, स्थिरता और लचीलापन। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन भूविज्ञान और रिमोट सेंसिंग विभाग, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला की ओर से किया जा रहा है। साथ ही इसमें SDMA, DDMA कांगड़ा, IIT धनबाद, IIT खड़गपुर, IIT गुवाहाटी, IISER कोलकाता, CSIR-CSIO चंडीगढ़ और WIHG देहरादून का सहयोग है।

 

मुख्य विषय:
1. हिमालयी पर्वतमाला (Orogen): टेक्टोनिक्स और विकास
2. भूकंप-टेक्टोनिक्स, भूकंपीय खतरा और भूकंपीय सूक्ष्म-क्षेत्रीकरण अध्ययन
3. भू-आकृति विज्ञान, सक्रिय भ्रंश और पुरा-भूकंप विज्ञान
4. प्राकृतिक आपदाएँ और नागरिक बुनियादी ढाँचे का विकास
5. हिमालय क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और लचीलापन
6. हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन
7. नीतिगत मामले
8. केस स्टडीज़

सम्मेलन पंजीकरण
इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए पहले पंजीकरण करवाना होगा। भारतीय छात्रों के लिए पंजीकरण शुल्क 1000 रुपए है, जबकि विदेशी छात्रों के लिए 100 डॉलर निर्धारित किया गया है। डेलीगेट के लिए पंजीकरण शुल्क 5000 रुपए है।

1905 के कांगड़ा भूकंप का स्थान दर्शाने वाला मानचित्र। Image: Internet

यह कार्यक्रम किस विषय पर आधारित है?
हिमालय में विवर्तनिक ढांचा और भूकंपीय खतरा:
हिमालयी पर्वत श्रृंखला भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के बीच अभिसरण (convergence) क्षेत्र को चिह्नित करती है। इस निरंतर अभिसरण के परिणामस्वरूप उत्तर की ओर झुकी हुई तीन प्रमुख ‘थ्रस्ट फॉल्ट’ प्रणालियाँ (thrust fault systems) अस्तित्व में आई हैं, जो उत्तर से दक्षिण की ओर क्रमशः नई होती जाती हैं-मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT), और मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT)।
ये थ्रस्ट फॉल्ट दोनों प्लेटों के बीच होने वाले भूपर्पटी संकुचन (crustal shortening) के एक हिस्से को समायोजित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्थलाकृति का सक्रिय निर्माण होता है और बार-बार विनाशकारी भूकंप आते हैं। हिमालयी क्षेत्र ने ऐतिहासिक काल में अनेक बड़े और विनाशकारी भूकंपों का सामना किया है, जो भूकंप की उत्पत्ति और उनकी घटनाओं के बारे में हमारे वैज्ञानिक ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए एक आधार (template) बन गए हैं। इन घटनाओं ने हमें भूकंपीय खतरों के प्रबंधन और शमन, सतत विकास और सुदृढ़ता (resilience) के महत्वपूर्ण पहलुओं की गहराई से पड़ताल करने का अवसर भी प्रदान किया है।

1905 के कांगड़ा भूकंप के बाद की तबाही का दृश्य। Image: Internet

1905 का कांगड़ा भूकंप: अनसुलझे सवाल और आधुनिक प्रगति:
4 अप्रैल 1905 का कांगड़ा भूकंप हाल के समय की ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसका विस्तृत दस्तावेजीकरण किया गया है और जिस पर गहन अध्ययन हुआ है। तथापि, इसकी उत्पत्ति, क्रियाविधि और इससे हुई क्षति के परिदृश्य को लेकर कौतूहल अभी भी बना हुआ है। हाल के अतीत में आए कई अन्य ऐतिहासिक भूकंपों के मामले में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। शायद ये कमियाँ और रहस्य, मुश्किल इलाकों और दूरदराज के क्षेत्रों में उपकरणों की कमी और वहाँ तक पहुँचने में कठिनाई के कारण थे, जिससे पक्षपातपूर्ण और अलग-अलग तरह के विचार सामने आए। हिमालयी क्षेत्र के ज़्यादातर हिस्सों में बेहतर और सघन उपकरण नेटवर्क होने से-जिसमें सीस्मोग्राफ़, जियोडेटिक उपकरण और अलग-अलग तरह के रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट्स के बड़े समूह के ज़रिए नियमित निगरानी शामिल है-किसी भी ऐसी प्राकृतिक और/ या मानव-जनित आपदा को समझने और उसका सामना करने की हमारी क्षमताएं काफ़ी बेहतर हुई हैं। भूकंप, जो सबसे जटिल प्राकृतिक घटनाओं में से एक है, उस पर विशेष ध्यान देने और ज़्यादा विचार-विमर्श करने की ज़रूरत है, ताकि हम एक टिकाऊ और मज़बूत भविष्य के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो सकें।

1905 के कांगड़ा भूकंप के परिणामस्वरूप सतह का फटना। Image: Internet

धर्मशाला-कांगड़ा: हिमालयी भू-गतिकी के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला:
धर्मशाला, भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य के कांगड़ा क्षेत्र का प्रशासनिक मुख्यालय है। कांगड़ा क्षेत्र अपनी मनमोहक दृश्यावली, विविध भू-आकृति विज्ञान, विवर्तनिकी और जलवायु के लिए जाना जाता है। इसके उत्तर में धौलाधार पर्वतमाला की बर्फ से ढकी शृंखला है, जो 200 किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र में फैली हुई है। ये पर्वत ‘लघु हिमालय’ (Lesser Himalaya) के भीतर स्थित हैं और एक विशाल स्थलाकृतिक अवरोध का निर्माण करते हैं, जो इस क्षेत्र की स्थानीय जलवायु को नियंत्रित करता है। धौलाधार पर्वतमाला के दक्षिण में, कांगड़ा क्षेत्र में ‘उप-हिमालय’ (Sub-Himalaya) की निचली पहाड़ियाँ स्थित हैं। इन दोनों के मध्य स्थित क्षेत्र को ‘कांगड़ा घाटी’ के नाम से जाना जाता है; यह घाटी धौलाधार पर्वतमाला से निकलने वाले मोटे ‘पंखे के आकार के निक्षेपों’ (fan deposits) से आच्छादित है। अपनी विशिष्टताओं के कारण, कांगड़ा क्षेत्र भारत और विदेशों के वैज्ञानिक समुदाय के बीच उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यह पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र (हॉटस्पॉट) होने के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आश्रय स्थल भी है।

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