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धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ, हिमालयी आपदाओं पर गहन मंथन

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते खतरे, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों की चेतावनी

धर्मशाला।

‘हिमालयन होराइज़न्स: टेक्टोनिक्स, सस्टेनेबिलिटी और रेज़िलिएंस-कांगड़ा भूकंप से आज तक’ विषय पर शनिवार को धर्मशाला के एक सभागार में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारम्भ दीप प्रज्वलन की रस्म के साथ हुआ। यह रस्म ज्ञान की खोज और आपदा जोखिमों को समझने तथा कम करने की साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक थी। इसके बाद, प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों को मंच पर आमंत्रित कर हिमाचली संस्कृति में स्वागत करते हुए पारंपरिक हिमाचली टोपी, शॉल तथा क्रिस्टल ट्री के रूप में स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका गर्मजोशी से अभिनंदन किया गया। ये उपहार इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भूवैज्ञानिक महत्व को दर्शाते थे।

विषय का औपचारिक परिचय
भूविज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. ए. के. महाजन ने औपचारिक रूप से सम्मेलन के विषय का परिचय दिया। प्रो. महाजन ने हिमालयी संदर्भ में टेक्टोनिक्स, स्थिरता और लचीलेपन पर इसके अंतर्विषयक फोकस को रेखांकित किया। उन्होंने आयोजन करने वाली संस्थाओं, सहयोगी निकायों और देश भर से आए शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं तथा छात्रों की विविध भागीदारी का भी संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।

परिचयात्मक टिप्पिणियां
इसके बाद इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. हर्ष के. गुप्ता, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ के निदेशक डॉ. शैलेश नायक और कांगड़ा की अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट शिल्पी बेक्टा ने संक्षिप्त परिचयात्मक टिप्पणियां दीं। इन सभी ने मिलकर वर्तमान परिदृश्य में इस सम्मेलन की प्रासंगिकता और तात्कालिकता पर ज़ोर दिया, विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता को देखते हुए।

उच्च मृत्यु दर को किया रेखांकित
अपने मुख्य भाषण (की-नोट) शैली के संबोधन में, प्रो. हर्ष. के. गुप्ता ने एशिया में प्राकृतिक आपदाओं, विशेष रूप से भूकंपों के कारण होने वाली उच्च मृत्यु दर को रेखांकित किया। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में भूकंपों के अलग-अलग प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की और एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया जो भूकंप की तीव्रता और उससे होने वाले संभावित नुकसान के बीच के संबंध को दर्शाता था। उन्होंने ‘सीस्मिक गैप्स’ की अवधारणा से परिचय कराया और वैज्ञानिक समझ तथा व्यापक जन जागरूकता के माध्यम से एक लचीले समाज के निर्माण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

ज़मीनी स्तर पर लचीलेपन को मज़बूत करने में हो युवा स्वयंसेवकों की भागीदारी
कांगड़ा के उपायुक्त हेमराज बैरवा ने आपदा की तैयारी में जिला प्रशासन की सक्रिय भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने समुदायों को प्रशिक्षित करने के लिए चल रहे प्रयासों का उल्लेख किया और ज़मीनी स्तर पर लचीलेपन को मज़बूत करने में युवा स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी पर ज़ोर दिया।

स्थानीय समुदायों के बीच मज़बूत समन्वय की वकालत
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेशक डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने व्यापक आपदा प्रबंधन योजना के अत्यंत महत्व पर ज़ोर दिया। डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने जोखिम कम करने की रणनीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक निकायों और स्थानीय समुदायों के बीच मज़बूत समन्वय की वकालत की।

मानव जीवन को हो सकते हैं गंभीर खतरे
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने हिमालय पर केंद्रित एक समयोचित और महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित करने के लिए आयोजकों की सराहना की। उन्होंने प्रतिनिधियों का स्वागत किया और पिछली आपदाओं से सीखने के महत्व पर प्रकाश डाला। इस क्षेत्र में पर्यटन के बढ़ते दबाव की ओर ध्यान दिलाते हुए, उन्होंने चेतावनी दी कि इससे नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन को गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं। उन्होंने मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणालियों, समुदाय-आधारित आपदा तैयारी योजनाओं और सूचित निर्णय लेने के लिए माइक्रोज़ोनेशन मानचित्रों के उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अलावा, उन्होंने वैज्ञानिक प्रगति को पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के साथ एकीकृत करने की वकालत की और सुझाव दिया कि डॉक्टरेट अनुसंधान को समुदाय-उन्मुख आपदा शमन प्रयासों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

सत्र का समापन पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान संकाय के डीन प्रो. दीपक पंत द्वारा दिए गए धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ, जिन्होंने उद्घाटन सत्र को सफल बनाने में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए सभी गणमान्य व्यक्तियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

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