छल से सरकार में न आती तो हिमाचल आर्थिक रूप से कंगाल न होता: त्रिलोक
कहा, अनुभवहीन, अप्रबंधन और पार्टी में मची कलह से कभी भी धराशाई हो सकती है सुक्खू सरकार

धर्मशाला।
झूठ की बुनियाद पर बनी सुक्खू सरकार स्वयं अपने अनुभवहीन, अप्रबंधन और पार्टी में मची कलह से कभी भी धराशाई हो सकती है। ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह कहना है भाजपा के प्रदेश वरिष्ठ प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय कार्य परिषद के सदस्य त्रिलोक कपूर का।
त्रिलोक कपूर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जनता को इस बात का आश्चर्य है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के दो सलाहकार हैं तो छोटे से राज्य हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को आधा दर्जन सलाहकार की फौज नियुक्त करने की क्या आवश्यकता थी। लेकिन यह मित्रों की सरकार है और मित्रों के चक्कर में प्रदेश को पूरी तरह बर्बाद करके रख दिया गया है।
त्रिलोक कपूर ने कहा कि प्रदेश में ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के दावों और ‘वित्तीय संकट’ की दुहाई के बीच पिछले तीन वर्षों का लेखा-जोखा एक गहरे विरोधाभास को जन्म देता है। जब सत्ता के गलियारों से बार-बार यह कहा जाता है कि प्रदेश का खजाना खाली है और विकास के लिए कर्ज लेना मजबूरी है, तब खर्चों की फेहरिस्त कुछ और ही हकीकत बयां करती है।
जायज मांगों को पूरा किया जा सकता था
कपूर ने कहा कि यदि हम दिसंबर 2022 से फरवरी 2026 तक के वित्तीय पदचिह्नों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि जिस राशि का उपयोग कर्मचारियों के लंबित एरियर, डीए की किस्तों या ‘हिमकेयर’ जैसी जीवनदायिनी योजनाओं के भुगतान के लिए हो सकता था, उसे उत्सवों, प्रचार और विशेषाधिकारों की भेंट चढ़ा दिया गया। केवल मंडी और धर्मशाला जैसे आयोजनों और रैलियों पर ही लगभग 70 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए, जबकि इतने ही बजट में हजारों कर्मचारियों की जायज मांगों को पूरा किया जा सकता था।
मासिक फिक्स रेंट ही करीब 1.5 करोड़ रुपए
त्रिलोक कपूर ने कहा कि आर्थिक अनुशासन की बातें तब बेमानी लगने लगती हैं, जब हेलीकॉप्टर और लग्जरी काफिलों पर खर्च की सीमाएं टूट जाती हैं। सरकार द्वारा लीज पर लिए गए हेलीकॉप्टर का मासिक फिक्स रेंट ही करीब 1.5 करोड़ रुपए है, जो पिछले 36 महीनों में तेल और संचालन खर्च मिलाकर 60 करोड़ रुपए के पार जा चुका है। साथ ही, मंत्रियों और चेयरमैनों की सुरक्षा और रसूख के लिए नई फॉर्च्यूनर और इनोवा हाईक्रॉस जैसी लग्जरी गाड़ियों की खरीद पर ही लगभग 15 करोड़ रुपए का बोझ डाला गया।
सरकार ने मितव्ययिता के बजाय भारी खर्च को चुना
भाजपा नेता कपूर ने कहा कि फिजूलखर्ची का एक और बड़ा उदाहरण राजनीतिक नियुक्तियों के रूप में सामने आता है। कैबिनेट रैंक से नवाजे गए 15 से अधिक चेयरमैन और ओएसडी के वेतन, भत्तों, निजी स्टाफ और सरकारी आवासों पर 25 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च हुई है। यह वह पैसा है जो सीधे तौर पर सत्ता के करीबी चेहरों को ‘एडजस्ट’ करने में इस्तेमाल हुआ, जबकि राज्य एक लाख करोड़ से ज्यादा के कर्ज के नीचे दब चुका है। यही नहीं कानूनी मोर्चे पर भी सरकार ने मितव्ययिता के बजाय भारी खर्च को चुना।
दिल्ली के महंगे वकीलों की ली सेवाएं
त्रिलोक कपूर ने कहा कि सुक्खू सरकार अपने राजनीतिक फैसलों और नीतिगत विवादों को सुलझाने के लिए दिल्ली के महंगे वकीलों की सेवाएं ली गईं, जिनकी प्रति पेशी फीस लाखों में है। विधानसभा की जानकारी के अनुसार लगभग 277 वकीलों और एडवोकेट जनरल कार्यालय के भारी-भरकम ढांचे पर करीब 100 करोड़ रुपए की ‘फिजूलखर्ची’ की गई है। यदि यह राशि जनहित में लगाई जाती, तो सहारा योजना के तहत गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की लंबित पेमेंट आसानी से हो सकती थी।
खजाने पर 90 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ
कपूर ने कहा कि अक्टूबर 2025 में विधायकों और मंत्रियों के वेतन-भत्तों में जो 24% की ऐतिहासिक वृद्धि की गई, उसने संचयी रूप से खजाने पर 90 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बढ़े हुए वेतन और दैनिक भत्ते उस समय बढ़ाए गए, जब प्रदेश आर्थिक तंगी का हवाला देकर जनकल्याणकारी योजनाओं में कटौती कर रहा था।
उन्होंने कहा कि प्रचार तंत्र और विज्ञापनों में भी ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का रंग पक्षपातपूर्ण नजर आता है। कम प्रसार संख्या वाले और पार्टी से जुड़े प्रकाशनों, विशेषकर ‘नेशनल हेराल्ड’ जैसे अखबारों को करोड़ों के विज्ञापन देना प्रदेश के हित से ज्यादा राजनीतिक तुष्टिकरण का हिस्सा लगता है। विज्ञापन बजट जोकि पिछले दो वर्षों में ही 10 करोड़ के पार पहुंच गया है, वह पिछली सरकारों के मुकाबले कहीं अधिक है।
‘कटौती’ और खास वर्ग के लिए ‘छूट’ की नीति
कपूर ने हैरानी जताते हुए कहा कि यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि सत्ता में आते ही कांग्रेस सरकार के मंत्रियों चेयरमैन और अधिकारियों ने अपने सरकारी मकानों और दफ्तरों की रिपेयर और रेनोवेशन में 97 करोड़ खर्च कर दिए। उच्चाधिकारियों के आतिथ्य और हाई-स्पीड इंटरनेट जैसे भत्तों में की गई समय-समय पर बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि आम जनता के लिए ‘कटौती’ और खास वर्ग के लिए ‘छूट’ की नीति अपनाई जा रही है। कुल मिलाकर यह 1040 करोड़ रुपए के करीब का वह खर्च है, जिसे टाला जा सकता था। यह सरेआम फ़िजूल खर्च था, लेकिन इसे ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के नाम पर प्रदेश की जनता की जेब पर लाद दिया गया।


