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हिमकारा: जेलों में सुधार, कौशल और पुनर्वास की नई इबारत

जेल कैदियों को मिला नया संबल और आत्मविश्वास, नए रोजगार की राह

धर्मशाला।

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जेल सुधार की दिशा में शुरू की गई हिमकारा आज राज्य की कारागार व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत है। यह पहल जेलों को केवल सजा के स्थान से निकालकर सुधार, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता के केंद्र के रूप में विकसित करने का सफल प्रयास है। हिमकारा का मूल उद्देश्य है कैदियों को काम के माध्यम से सुधार का अवसर देना, उन्हें व्यावसायिक कौशल से लैस करना और रिहाई के बाद समाज की मुख्यधारा से सम्मानपूर्वक जोड़ना है।

धर्मशाला में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय के नाम से बनी जेल में भी सजायाफता कैदी इस योजना के तहत विभिन्न काम सीख कर कार्य कर रहे हैं। हिमकारा से उन्हें जीवन में एक नई राह मिली है और आत्म विश्वास जगा है कि सज़ा पूर्ण करने के बाद एक जिम्मेदार नागरिक की तरह वे भी एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिऐ एक नये रोजगार के लिए तैयार हो रहे हैं।

हिमकारा के अंतर्गत कैदियों को जेल के भीतर ही व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है और उनसे तैयार किए गए उत्पादों को हिमकारा ब्रांड के तहत बाजार तक पहुँचाया जाता है। इससे कैदियों में न केवल कार्य अनुशासन विकसित होता है, बल्कि उन्हें अपनी मेहनत से कमाई का अवसर भी मिलता है।

हिमकारा के तहत राज्य की विभिन्न जेलों में कैदियों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार अलग-अलग कार्यों में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिनमें प्रमुख रूप से बेकरी एवं कन्फेक्शनरी उत्पाद, सैलून, फाॅस्ट् फूड, कार वाॅश, फूलों की नर्सरी, पशु पालन दुग्ध उत्पादन, कारपेंट्री, वेल्डिंग व अन्य तकनीकी कार्य शामिल हैं। इन इकाइयों में कैदी न केवल काम करना सीखते हैं, बल्कि आधुनिक उपकरणों और गुणवत्ता मानकों की जानकारी भी प्राप्त करते हैं, जो उन्हें रिहाई के बाद रोजगार या स्वरोजगार में सहायक बनाती है।

कैदियों द्वारा तैयार उत्पादों की बिक्री के लिए राज्य में हिमकारा स्टोर्स की स्थापना की गई है। इन स्टोर्स के माध्यम से जेलों में बने उत्पाद और अन्य वस्तुएं आम लोगों तक पहुँच रही हैं। इससे एक ओर कैदियों की मेहनत को उचित पहचान मिल रही है, वहीं दूसरी ओर समाज में यह संदेश भी जा रहा है कि जेलों में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। हिमकारा ने कैदियों के जीवन में कई स्तरों पर बदलाव लाया है। काम मिलने से मानसिक तनाव में कमी आई है। कौशल सीखने से आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान बढ़ा है। मेहनत की कमाई से जिम्मेदारी और अनुशासन की भावना विकसित हुई है।

हिमकारा न केवल कैदियों के लिए, बल्कि समाज और प्रशासन के लिए भी लाभकारी साबित हो रही है। एक सुधरा हुआ, प्रशिक्षित कैदी समाज में लौटकर उपयोगी नागरिक बन सकता है। वहीं जेल प्रशासन के लिए यह पहल अनुशासन, उत्पादकता और सकारात्मक माहौल बनाए रखने में सहायक है। जेल में विभिन्न गतिविधियों से जुड़े बंदियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि हिमकारा योजना के तहत इस पहल ने उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर दिया है।

जेल बेकरी में कार्य कर रहे सोम बहादुर, सब्जी एवं फलों की दुकान में कार्यरत बलवींद्र कुमार, कारवाॅश में कार्य कर रहे सचिन राणा, डेयरी में कार्यरत अश्वनी कुमार, कारपेंट्री में कार्य कर रहे लक्की राज तथा फूलों की नर्सरी और पाॅलीहाउस में कार्यरत सुशील कुमार और विनय कुमार का कहना है कि सजा के दौरान उन्हें जो हुनर सीखने का अवसर मिला है, वह उनके भविष्य के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

उन्होंने बताया कि जेल से बाहर जाने के बाद वे इन कौशलों के आधार पर अपना स्वरोजगार स्थापित करने में सक्षम होंगे और आत्मनिर्भर बन सकेंगे। साथ ही, इन कार्यों से मिलने वाली पारिश्रमिक राशि का एक हिस्सा वे अपने परिवारों को भी भेजते हैं, जिससे उन्हें अपने परिवार की सहायता करने का संतोष मिलता है। बंदियों ने यह भी कहा कि दिनभर रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहने से उनका मानसिक तनाव कम होता है और उन्हें एक सकारात्मक एवं नए जीवन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

जेल अधीक्षक विकास भटनागर

क्या कहते हैं जेल अधीक्षक विकास भटनागर

जेल अधीक्षक विकास भटनागर कहते हैं कि हिमाचल सरकार द्वारा एक प्रदेश-व्यापी अभियान के तहत इस कार्य को आगे बढ़ाया जा रहा है। ‘हिमकारा’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सकारात्मक सोच है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि बंदियों को पुनः समाज में एक अच्छे और जिम्मेदार नागरिक के रूप में स्थापित किया जा सके तथा उन्हें सुधार के साथ एक बेहतर भविष्य की दिशा प्रदान की जा सके।

विकास भटनागर कहते हैं कि जेलों में इस दिशा में कई प्रकार की गतिविधियां शुरू की गई हैं, जैसे डेयरी, कार वाॅशिंग, कारपेंट्री, सैलून, नर्सरी आदि। इन सभी प्रयासों का मुख्य उद्देश्य सुधार और पुनर्वास की दिशा में काम करना है।

यह देखा गया है कि यदि कैदियों को खाली रखने की बजाय उन्हें किसी न किसी रचनात्मक कार्य में लगाया जाए, तो उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है। इससे उनकी मानसिकता में सुधार होता है और वे नई कौशल सीख पाते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए जेलों में इस प्रकार के कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, ताकि बंदी अपना अधिक से अधिक समय रचनात्मक कार्यों में लगा सकें। इससे वे नए रोजगार सीखकर जब जेल से बाहर आएं, तो आत्मनिर्भर बन सकें और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। जेल अधीक्षक कहते हैं कि इन प्रयासों के परिणामस्वरूप एक सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिला है। कई बंदी जेल से रिहा होने के बाद उन्हीं कार्यों को अपनाकर अपना जीवन बेहतर बना रहे हैं, जो उन्होंने जेल के अंदर सीखे थे।

जेल अधीक्षक बताते हैं कि लाला लाजपत राय जिला एवं मुक्त सुधार गृह धर्मशाला का अपना एक इतिहास है। एक सदी से भी पुरानी इस जेल पुरानी जेल की स्थापना वर्ष 1913 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान एक सब-जेल के रूप में की गई थी। इस स्थान ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कई वीर सेनानियों के संघर्ष और बलिदान का इतिहास देखा है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई प्रमुख क्रांतिकारी यहां बंदी रहे। इनमें सबसे प्रमुख नाम लाला लाजपत राय का है, जो 21 अप्रैल 1922 से 9 जनवरी 1923 तक यहां बंदी रहे। इसके अलावा बासी राम, मन्नी राम, पंचम चंद, सरीन चंद और मौलवी हबीबुर रहमान जैसे स्वतंत्रता सेनानी भी अलग-अलग समय में यहां कैद रहे। मौलवी जकारिया लुधियाना भी वर्ष 1922 से 1942 के बीच यहां बंदी रहे। आज यह संस्थान केवल एक जेल नहीं, बल्कि एक सुधार गृह के रूप में कार्य कर रहा है, जहां कैदियों को समाज में पुनः सम्मानजनक जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है। 

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