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भाजपा के प्रदेश वरिष्ठ प्रवक्ता त्रिलोक कपूर का आरोप, ‘कांगड़ा के संस्थानों को बर्बादी की ओर धकेल रही सुक्खू सरकार’

कहा, पर्यटन राजधानी का खोखला नारा, स्वास्थ्य-शिक्षा-अनुसंधान के संस्थान बदहाल

धर्मशाला।

हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सुक्खू सरकार की नीतियों, प्रशासनिक विफलताओं और लगातार अनदेखी के कारण जिला कांगड़ा के प्रमुख और ऐतिहासिक संस्थानों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। केवल कागजों और सरकारी बयानों में कांगड़ा को पर्यटन राजधानी घोषित कर देने से जमीनी विकास नहीं होता। जिस जिले के संस्थानों ने दशकों तक पूरे प्रदेश को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और अनुसंधान के क्षेत्र में नेतृत्व दिया है, आज उन्हीं संस्थानों को कांग्रेस सरकार की उपेक्षा और कुप्रबंधन का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यह केवल संस्थानों की बदहाली नहीं, बल्कि कांगड़ा के भविष्य के साथ खिलवाड़ का प्रश्न है। यह कहना है भाजपा नेता और हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता त्रिलोक कपूर का।

प्रदेश वरिष्ठ प्रवक्ता ने कहा कि प्रदेश के प्रमुख चिकित्सा संस्थान टांडा मेडिकल कॉलेज में स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को बुनियादी दवाइयां, सुई, आवश्यक इंजेक्शन और पैरासिटामोल जैसी साधारण दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। हिमकेयर और आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत मिलने वाली सेवाएं बाधित होने के कारण गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को इलाज का आर्थिक बोझ स्वयं उठाना पड़ रहा है। अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि एक-एक बिस्तर पर तीन-तीन मरीजों को लिटाने की नौबत आने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि जब प्रदेश की सरकार अपने सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में मरीज को मूलभूत दवा तक उपलब्ध नहीं करवा सकती, तो कांगड़ा को पर्यटन राजधानी बनाने के सरकारी दावों का आम जनता क्या करे?

त्रिलोक कपूर ने कहा कि उत्तरी भारत के प्रसिद्ध आयुर्वेदिक कॉलेज पपरोला की स्थिति भी चिंताजनक है। संस्थान में शिक्षकों के अनेक पद खाली पड़े हैं और स्थायी नियुक्तियों के बजाय प्रतिनियुक्ति के सहारे व्यवस्था खींचने का प्रयास किया जा रहा है। नई भर्तियों के अभाव में शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो रही है। इसका सीधा परिणाम यह है कि स्नातक (UG) की सीटें 75 से घटाकर 65 और स्नातकोत्तर (PG) की सीटों में भी कटौती की गई है। जिस संस्थान को आयुर्वेद शिक्षा का राष्ट्रीय केंद्र बनना चाहिए था, वहां सीटें बढ़ाने के बजाय घट रही हैं। क्या यही सुक्खू सरकार की शिक्षा नीति है संस्थानों को मजबूत करने के बजाय उनकी क्षमता लगातार कम करना?

भाजपा नेता त्रिलोक कपूर ने कहा कि सबसे गंभीर और चिंताजनक स्थिति पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय की है। पिछले तीन वर्षों से विश्वविद्यालय में स्थायी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो पाई है। माननीय उच्च न्यायालय ने कुलपति चयन प्रक्रिया में राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को UGC Regulations, 2018 के विपरीत पाते हुए निरस्त कर दिया है। इससे यह गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर सुक्खू सरकार को स्थापित नियमों में ऐसे बदलाव करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या कांग्रेस सरकार विश्वविद्यालय की स्वायत्त और नियमसम्मत व्यवस्था के बजाय अपनी पसंद के कठपुतली नेतृत्व को स्थापित करना चाहती थी? अब सरकार को किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रहते हुए पारदर्शी, नियमसम्मत और शीघ्र प्रक्रिया के माध्यम से स्थायी कुलपति की नियुक्ति करनी चाहिए।

त्रिलोक कपूर ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी की गई, जिसके विरोध में छात्रों को मजबूर होकर आंदोलन और हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा। यह स्थिति सरकार की शिक्षा के प्रति संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जिस प्रदेश में हजारों परिवार अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां फीस बढ़ाकर विद्यार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना किस जनहितकारी नीति का हिस्सा है?

त्रिलोक कपूर ने कहा कि विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। उन्हें हर महीने की 10 तारीख तक वेतन और पेंशन के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। समय पर भुगतान न होने से बैंक की किस्तों और अन्य देनदारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। बच्चों की स्कूल-कॉलेज की फीस, घर के रोजमर्रा के खर्च और अन्य आवश्यक जिम्मेदारियां प्रभावित हो रही हैं। जिस कर्मचारी ने अपना पूरा जीवन संस्थान और प्रदेश की सेवा में लगा दिया, उसे अपने ही वेतन और पेंशन के लिए इंतजार करवाना सरकार की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

कपूर ने कहा कि विश्वविद्यालय में आउटसोर्स पर कार्यरत तकनीकी कर्मियों के साथ भी गंभीर अन्याय किया जा रहा है। जारी आधिकारिक आदेशों के अनुसार जूनियर इंजीनियर (JE), कंप्यूटर ऑपरेटर और फाइनेंस कर्मियों का श्रेणी दर्जा ‘हायर स्किल्ड’ से घटाकर ‘स्किल्ड लेबर’ कर दिया गया है। उनका दैनिक मानदेय 800 रुपये से घटाकर सीधे 500 रुपये कर दिया गया है और कटौती के बाद उन्हें मात्र 480 रुपये प्रतिदिन मिलने की बात सामने आई है। उच्च शिक्षित इंजीनियरों और तकनीकी रूप से दक्ष युवाओं को इस स्तर का पारिश्रमिक देना उनके श्रम, योग्यता और सम्मान के साथ गंभीर अन्याय है।

वर्तमान में केवल लगभग 600 पद ही भरे
भाजपा नेता ने कहा कि संस्थान का प्रशासनिक और शैक्षणिक ढांचा भी लगातार सिकुड़ रहा है। विश्वविद्यालय में पहले कुल कर्मचारियों की स्वीकृत संख्या लगभग 2000 थी, जिसे घटाकर 1100 किया गया और वर्तमान में केवल लगभग 600 पद ही भरे हुए हैं। शिक्षकों और वैज्ञानिकों के लगभग 60 प्रतिशत पद रिक्त होने से पठन-पाठन और अनुसंधान कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। त्रिलोक कपूर ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय केवल भवनों और पदों का नाम नहीं है। यह हिमाचल के किसानों की उम्मीद, कृषि अनुसंधान की रीढ़ और प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। यदि यहां वैज्ञानिक नहीं होंगे, शिक्षक नहीं होंगे, स्थायी नेतृत्व नहीं होगा और कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिलेगा, तो इसका नुकसान केवल विश्वविद्यालय को नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के किसानों को होगा।

कांगड़ा के विकास में भी लगातार रुकावटें पैदा की जा रही
जब माननीय न्यायालय ने कृषि विश्वविद्यालय की बहुमूल्य भूमि पर ‘टूरिज्म विलेज’ बनाने के सरकार के प्रयास पर रोक लगाई, उसके बाद संस्थान के प्रति प्रशासनिक रवैया और अधिक उपेक्षापूर्ण होने के आरोप सामने आए हैं। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि कृषि विश्वविद्यालय को मजबूत करना उसकी प्राथमिकता है या उसकी भूमि और संस्थागत स्वरूप को कमजोर करना। उन्होंने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय कांगड़ा के विकास में भी लगातार रुकावटें पैदा की जा रही हैं। जदरांगल परिसर के निर्माण हेतु आवश्यक लगभग 30 करोड़ रुपये की राशि जारी न करना और देहरा परिसर में बिजली तथा पानी से संबंधित मूलभूत देनदारियों का समय पर भुगतान न करना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर कांगड़ा में स्थापित होने वाले इन राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों को राज्य सरकार अपेक्षित सहयोग क्यों नहीं दे रही है।

त्रिलोक कपूर ने कहा कि सुक्खू सरकार को अब कांगड़ा की जनता को जवाब देना होगा। सरकार यह बताए कि टांडा में दवाओं की कमी क्यों है, पपरोला में शिक्षक और सीटें क्यों घट रही हैं, कृषि विश्वविद्यालय में स्थायी कुलपति क्यों नहीं है, कर्मचारियों और पेंशनरों को समय पर भुगतान क्यों नहीं हो रहा, आउटसोर्स कर्मचारियों के पारिश्रमिक में कटौती क्यों की गई, शिक्षकों और वैज्ञानिकों के हजारों पदों में से बड़ी संख्या रिक्त क्यों है और केंद्रीय विश्वविद्यालय के परिसरों के विकास में राज्य सरकार की ओर से आवश्यक सहयोग क्यों नहीं दिया जा रहा है।

‘सरकार तत्काल तथ्यात्मक श्वेतपत्र जारी करे’
भाजपा नेता कपूर ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी मांग करती है कि कांग्रेस की सुक्खू सरकार इन सभी संस्थानों की प्रशासनिक, वित्तीय और शैक्षणिक स्थिति पर तत्काल तथ्यात्मक श्वेतपत्र जारी करे तथा प्रत्येक संस्थान की समस्या के समाधान के लिए स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना जनता के सामने रखे। कांगड़ा की जनता घोषणाएं नहीं, परिणाम चाहती है। भाषण नहीं, संस्थानों की मजबूती चाहती है। पर्यटन राजधानी का तमगा नहीं, अपने बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा, मरीजों के लिए दवा, युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार और किसानों के लिए मजबूत अनुसंधान व्यवस्था चाहती है। त्रिलोक कपूर ने कहा कि यदि सुक्खू सरकार ने इन गंभीर समस्याओं को राजनीतिक बयानबाजी समझकर टालने का प्रयास किया और कांगड़ा के संस्थानों की उपेक्षा जारी रखी, तो भारतीय जनता पार्टी जनहित में सड़क से लेकर सदन तक सरकार को घेरने का काम करेगी।

भाजपा चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी
कांगड़ा के संस्थानों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को भाजपा चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी। यह लड़ाई किसी एक संस्था की नहीं, कांगड़ा के भविष्य की लड़ाई है। इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश शर्मा, प्रदेश मीडिया सह-प्रभारी एडवोकेट विश्व चक्षु, ज़िला कांगड़ा भाजपा महामंत्री सुनेजा चौधरी, धर्मशाला नगर निगम के महापौर, धर्मशाला शहरी भाजपा मंडल अध्यक्ष डॉ. विशाल नैहरिया भी मौजूद रहे।

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