संकट में ‘देवभूमि’: हिमाचल के पर्यावरण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CEC को सौंपी जांच की कमान
हिमालय के बिगड़ते हालात पर SC की पैनी नजर; पुरानी रिपोर्ट देने पर राज्य सरकार को लगाई फटकार
धर्मशाला।
हिमाचल प्रदेश के नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को बचाने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत ने अब मोर्चा संभाल लिया है। देवभूमि में बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की कटान और पहाड़ों के सीने को चीरकर किए जा रहे अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने न केवल राज्य सरकार की पुरानी रिपोर्ट को खारिज किया, बल्कि अब इस पूरे मामले की कमान ‘केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति’ यानी CEC सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी को सौंप दी है।
हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बढ़ती विकासात्मक गतिविधियों, ग्लेशियरों के पिघलने, पेड़ों की कटाई और पर्यटन वाहनों के बढ़ते दबाव के बीच पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। इस गंभीर विषय को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने हिमाचल प्रदेश में पर्यावरणीय प्रभावों की समीक्षा शुरू कर दी है। कमेटी ने प्रदेश के संबंधित विभागों और विशेषज्ञों के साथ धर्मशाला में प्रारंभिक बैठक कर विभिन्न पर्यावरणीय पहलुओं पर चर्चा की।

सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी के सदस्य डॉ सतीश गड़कोटी ने बताया कि कमेटी ने प्रारंभिक बैठक में करीब नौ महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया है। विशेषज्ञ सदस्यों तथा प्रदेश के संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ बातचीत के आधार पर कमेटी अपनी निष्कर्षात्मक रिपोर्ट तैयार करेगी और आवश्यक सिफारिशें करेगी।
डॉ गड़कोटी ने बताया कि मानसून अवधि को देखते हुए कमेटी ने कुछ अतिरिक्त समय मांगा था और उसे छह सप्ताह का समय मिला है। हालांकि, महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों को देखते हुए कमेटी की कोशिश है कि रिपोर्ट को जल्द से जल्द तैयार कर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए।
डॉ गड़कोटी ने कहा कि ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल हिमाचल या भारत की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय है। हिमालयी क्षेत्र में हाल के घटनाक्रम इस खतरे की गंभीरता को सामने ला रहे हैं। कमेटी की प्राथमिकताओं में ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं तथा रिपोर्ट में इन पर आवश्यक सुझाव दिए जाएंगे।

फोरलेन, टनल और अन्य निर्माण परियोजनाओं के दौरान पेड़ों की कटाई तथा उसके मुकाबले पौधरोपण की स्थिति पर पूछा तो डॉ गड़कोटी ने कहा कि देश में प्रतिपूरक पौधरोपण और वनीकरण का प्रावधान है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती पौधों की सर्वाइवल रेट है। केवल पौधरोपण का लक्ष्य पूरा करना पर्याप्त नहीं, बल्कि लगाए गए पौधों की निगरानी और उनके जीवित रहने की स्थिति सुनिश्चित करना जरूरी है।
डॉ सतीश गड़कोटी का कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरियों के बाद उनकी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रभावी मॉनिटरिंग से कई पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। पहाड़ी और पर्यटन क्षेत्रों में बढ़ते वाहनों के दबाव पर कहा कि सड़कों और संबंधित क्षेत्रों की अपनी कैरिंग कैपेसिटी होती है। इसलिए यह तय करना जरूरी है कि किसी क्षेत्र में कितने वाहनों का दबाव पर्यावरण और बुनियादी ढांचे के लिए उचित है।

डॉ गड़कोटी ने कहा कि पूरा हिमालय संवेदनशील क्षेत्र है और इसे केवल हिमाचल, उत्तराखंड या जम्मू-कश्मीर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाने और आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है। कुछ क्षेत्रों को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया घोषित करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं।



