कांगड़ा के सरकारी स्कूलों में ‘शिक्षा के अधिकार’ की उड़ी धज्जियां: सोशल ऑडिट में सामने आई डरावनी तस्वीर
सोशल ऑडिट में खुली पोल, 78% स्कूलों में चारदीवारी तक नहीं
धर्मशाला।
हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा में शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी डरावनी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी दावों की कलई खोलकर रख दी है। यह खुलासा सर्व शिक्षा अभियान के तहत हुए ‘सोशल ऑडिट’ में हुआ है कि जिले के सरकारी स्कूल न केवल बुनियादी ढांचे के लिए तरस रहे हैं, बल्कि वहां छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य भी गंभीर खतरे में है।
2,364 स्कूलों के बीच चौंकाने वाली रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की टीम द्वारा जिले के 519 स्कूलों के गहन मूल्यांकन के बाद यह रिपोर्ट धर्मशाला में आयोजित जनसुनवाई में पेश की गई। उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा की मौजूदगी में सार्वजनिक की गई इस रिपोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
रिपोर्ट के मुख्य और चिंताजनक बिंदु:
सोशल ऑडिट के सीएसए मेंबर हिमांशु ने बताया कि 44% स्कूलों में पर्याप्त कक्षाएं और स्टाफ रूम तक नहीं हैं। इतना ही नहीं 27% स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए डेस्क-बेंच (फर्नीचर) उपलब्ध नहीं है।
78% स्कूलों में चारदीवारी या फेंसिंग नहीं है, जिससे परिसर असुरक्षित हैं। 65% स्कूल मुख्य सड़क से नहीं जुड़े हैं, जिससे दिव्यांग बच्चों को भारी परेशानी होती है।
करीब 9% स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 40% से अधिक स्कूलों में किशोरियों को सैनिटरी पैड तक उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं।
9% स्कूलों में पीने का साफ पानी नहीं है, जबकि 2% स्कूलों में ‘मिड-डे मील’ के लिए रसोईघर तक की व्यवस्था नहीं है।
मानसिक स्वास्थ्य और गुणवत्ता पर प्रहार
सोशल ऑडिट की सबसे गंभीर बात यह रही कि सर्वे किए गए ‘एक भी विद्यालय में’ पेशेवर काउंसलिंग की सुविधा नहीं मिली। इसके अलावा, 80% स्कूल पुस्तकालय के मानकों को पूरा करने में विफल रहे हैं। प्रशासन की सुस्ती का आलम यह है कि 48% स्कूलों में केंद्र सरकार के ‘वन नेशन, ग्रेट नेशन’ कार्यक्रम का पालन तक नहीं हो रहा है।

जवाबदेही पर उठे सवाल
जनसुनवाई में उपस्थित 2,000 से अधिक अभिभावकों और एसएमसी सदस्यों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ा रोष व्यक्त किया। रिपोर्ट में अधीनस्थ शिक्षा अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण न किए जाने और निगरानी तंत्र के पूरी तरह फेल होने की बात कही गई है। अब यह रिपोर्ट राज्य शिक्षा विभाग को आगामी कार्रवाई के लिए भेजी जाएगी। जानकारों का मानना है कि यदि इन बुनियादी खामियों को जल्द दूर नहीं किया गया, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना मात्र कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।


