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पांच दशक का वनवास खत्म: पौंग विस्थापितों को मिला अपनी माटी का हक

'व्यवस्था परिवर्तन' से 131 परिवारों को मिला भूमि का मालिकाना हक, घर बनाने के लिए 3 लाख रुपए की मदद

धर्मशाला।

सुख सरकार ने पांच दशकों से अपनी माटी से बेगाने हुए कांगड़ा जिला के 131 पौंग विस्थापितों के आंसुओं को पोंछकर उनके जीवन में सुख की नई रोशनी बिखेरी है। सुख सरकार के भागीरथी प्रयासों से झकलेड़, खैरियां, छप्पर, भटोली फकोरियां तथा भंगोली के 131 पोंग विस्थापित परिवारों को जमीन का मालिकाना मिला है। इन प्रयासों ने न केवल पोंग बांध विस्थापितों को भूमि मालिक बनाया है, बल्कि उनके खोए हुए गौरव, आत्मसम्मान और सुरक्षित भविष्य को भी पूरी तरह बहाल कर व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प को साकार किया है।

झकलेड़ की पौंग विस्थापित परिवारों की पूजा रानी, निशा देवी कहती हैं कि पिछले तीन दशकों से विस्थापित परिवार केवल अपने कानूनी अधिकारों के लिए अदालतों और दफ्तरों के चक्कर काटते रहे। स्थिति यहां तक आ पहुंची थी कि विस्थापितों को अपने हक से जुड़े दस्तावेज जुटाने के लिए भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था, लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के संवेदनशील नेतृत्व में वर्तमान प्रदेश सरकार ने पाँच दशकों से लंबित इस मानवीय त्रासदी का स्थायी समाधान निकाला है जो मांगें वर्षों तक केवल फाइलों में दबी रहीं, उन्हें वर्तमान सरकार ने अपनी व्यवस्था परिवर्तन की नीति से धरातल पर सच कर दिखाया है। उनका कहना है कि पहले जमीन का मालिकाना हक नहीं होने के कारण स्थायी निवास प्रमाण पत्र इत्यादि बनाने में भी लोगों को परेशानी होती थी लेकिन सरकार के इस निर्णय से अब पौंग विस्थापितों को एक बहुत बड़ी राहत मिली है।

Image: DPRO

मुख्यमंत्री ने विस्थापितों के इस दर्द समझा
पौंग विस्थापित झकलेड़ के जगदीश चंद तथा नवल किशोर कहते हैं कि 1960 और 70 के दशक में ब्यास नदी पर पोंग बांध का निर्माण देश की सिंचाई और बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था। इस परियोजना के कारण हजारों परिवारों को अपनी उपजाऊ भूमि और पुश्तैनी आशियाने छोड़ने पड़े तथा कई विस्थापितों ने उस समय हरिपुर में रहने के लिए आश्रय ढूंढा और उस जगह का नाम भी इंदिरा कालोनी पड़ गया, विस्थापित बस तो गए, लेकिन मालिकाना हक उनको नहीं मिला था।

अब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विस्थापितों के इस दर्द को न केवल समझा, बल्कि इच्छाशक्ति दिखाते हुए प्रशासनिक बाधाओं को दूर किया और पोंग विस्थापित परिवारों को भूमि का मालिकाना हक दिलाकर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित किया है। पौंग विस्थापितों का कहना है कि भूमि का मालिकाना हक पाने वाले प्रत्येक पात्र परिवार को मकान बनाने के लिए ₹3 लाख की विशेष वित्तीय सहायता देने का निर्णय लिया है। यह कदम दर्शाता है कि सरकार केवल औपचारिकता पूरी नहीं कर रही, बल्कि पूर्ण पुनर्वास के संकल्प पर काम कर रही है।

झकलेड़ के नवल किशोर का कहना है कि जब सरकार के इरादे नेक और नीतियां जन-केंद्रित हों, तो दशकों पुरानी उलझनें भी हफ्तों में सुलझ जाती हैं। सुक्खू सरकार ने पोंग विस्थापितों की आँखों के आंसुओं को पोंछकर उनके जीवन में सुख की नई रोशनी बिखेरी है। यह कदम हिमाचल प्रदेश के इतिहास में सुशासन, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनशीलता के एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हुआ है।

भूमि मालिक बनाने का सफर चरणबद्ध नीति
पौंग विस्थापित परिवारों को जमीन का असली मालिकाना हक (पट्टे) सौंपने की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई है इसके पहले चरण (हरिपुर) में स्वयं मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 89 पात्र विस्थापित परिवारों को भूमि आवंटन के पट्टे सौंपकर इस ऐतिहासिक अभियान की शुरुआत की थी। दूसरे चरण (भटोली फकोरियां) में सरकार की इसी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए हाल ही में देहरा की स्थानीय विधायक कमलेश ठाकुर की मौजूदगी में 42 और पात्र विस्थापित परिवारों को भूमि के पट्टे वितरित किए गए। उन्होंने बताया कि लंबे समय से लंबित पड़े मालिकाना हक के दावों को वन अधिकार अधिनियम के तहत तेजी से सुलझाया जा रहा है, जिससे विस्थापितों को बिना किसी कानूनी अड़चन के जमीन मिल सके। ख्1,

घर बनाने के लिए 3 रुपए लाख की बड़ी वित्तीय सहायता
सरकार सिर्फ जमीन देकर ही नहीं रुक गई है। विस्थापित परिवारों के स्थायी पुनर्वास और उन्हें सम्मानजनक जीवन देने के लिए भूमि आवंटित होने वाले प्रत्येक पात्र विस्थापित परिवार को अपना पक्का घर बनाने के लिए सरकार की ओर से 3 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। यह कदम विस्थापितों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मील का पत्थर साबित हो रहा है।

आवश्यक राजस्व दस्तावेज बनवाने में होगी आसानी
उपायुक्त ने बताया कि पांच दशकों से भूमिहीन होने के कारण इन परिवारों की नई पीढ़ियां बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही थीं। अब ये परिवार आसानी से अपना हिमाचली बोनाफाइड (स्थायी निवासी प्रमाण पत्र) और अन्य आवश्यक राजस्व दस्तावेज बनवा पा रहे हैं। मालिकाना हक मिलने के बाद अब ये परिवार बैंकिंग लोन, कृषि सब्सिडी और अन्य कल्याणकारी सरकारी योजनाओं से सीधे जुड़ सकेंगे।

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