धर्मशाला।
भूमि अधिग्रहण और विस्थापन की दोहरी मार झेल रहे सनौरा ग्राम पंचायत के ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब दे गया है। विकास की वेदी पर अपने आशियानों की बलि देने को तैयार ग्रामीण, प्रशासन की ‘आंशिक अधिग्रहण’ की नीति के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन की अदूरदर्शी नीतियों के कारण उनके घर भविष्य में एक गहरी ‘खाई’ में तब्दील हो जाएंगे, जहां जीना नामुमकिन होगा।
R&R स्कीम पर DC के साथ निर्णायक बैठक
पुनर्वास और पुनर्व्यवस्था स्कीम को अमलीजामा पहनाने के लिए आज जिला उपायुक्त कार्यालय में एक अहम बैठक बुलाई गई। बैठक से पूर्व ग्राम पंचायत सनौरा के प्रधान (ऑर्डिनरी कैप्टन) अश्वनी कुमार के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने DC से मुलाकात की और प्रभावित परिवारों की समस्याओं से जुड़ी एक विस्तृत फाइल सौंपी। प्रधान अश्वनी कुमार ने बताया कि उपायुक्त ने उनकी मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाते हुए दोपहर 3 बजे होने वाली मुख्य बैठक में इन सभी बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करने का आश्वासन दिया है।
60 फीट ऊंची दीवार और सड़क के बीच कैद होंगे ग्रामीण
प्रभावित ग्रामीण रमेश चंद और नरेंद्र सिंह ने अधिग्रहण नीति की विसंगतियों को उजागर करते हुए बताया कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत उनकी जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। साल 2024 में जारी 12 मीटर चौड़ी परिधीय सड़क (Peripheral Road) की नोटिफिकेशन ने उनकी रातों की नींद उड़ा दी है।
नरेंद्र सिंह का कहना है कि प्रशासन हमारे मकानों का केवल कुछ हिस्सा अधिग्रहित करना चाहता है, जिसे हम कतई स्वीकार नहीं करेंगे। घर के पीछे एयरपोर्ट की 50-60 फीट ऊंची दीवार खड़ी होगी और सामने की तरफ ऊंची सड़क बनेगी। ऐसे में हमारे घर किसी गहरी खाई की तरह बीच में फंस जाएंगे, जहां न रोशनी पहुंचेगी और न ही निकास का रास्ता होगा।
बाढ़ का खतरा और मुआवजे की अधूरी जंग
सनौरा का यह क्षेत्र पहले से ही ‘फ्लडेड जोन’ के रूप में चिन्हित है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में भी मानसून के दौरान यहां 2-2 फुट तक पानी जमा हो जाता है। यदि एक तरफ एयरपोर्ट की ऊंची बाउंड्री और दूसरी तरफ ऊंची सड़क बन गई, तो बारिश का पानी और पहाड़ों से आने वाली मिट्टी सीधे उनके घरों को मलबे में तब्दील कर देगी।
ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें अब तक केवल घर के पीछे वाली जमीन का मुआवजा मिला है, जबकि मकानों के अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया अब भी अधर में है। उनकी स्पष्ट मांग है कि प्रशासन उनके मकानों का आंशिक नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से अधिग्रहण करे और उचित मुआवजा प्रदान करे, ताकि वे कहीं और सुरक्षित जीवन बिता सकें।
अब सबकी निगाहें प्रशासन और ग्रामीणों के बीच होने वाली उच्च स्तरीय बैठक पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि विकास की इस दौड़ में आम आदमी का आशियाना बचेगा या वह व्यवस्था की फाइलों में दबकर रह जाएगा।



