‘दस गारंटियों और चार साल के कामकाज का दें हिसाब’
‘वोट बचाओ देश बचाओ’ रैली के बीच भाजपा नेता विपिन सिंह परमार का सुक्खू सरकार से तीखा सवाल
पालमपुर।
‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली के माध्यम से कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन के सहयोगी दलों ने एक बार फिर देश की चुनावी व्यवस्था, निर्वाचन आयोग और कथित वोट चोरी को लेकर सवाल उठाए हैं। लेकिन इस राजनीतिक अभियान के बीच हिमाचल प्रदेश की जनता भी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से कुछ सीधे और बुनियादी सवालों के जवाब चाहती है।
वरिष्ठ नेता, प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष एवं सुलह विधानसभा क्षेत्र से विधायक विपिन सिंह परमार ने कहा कि लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना राजनीतिक दलों का अधिकार है, लेकिन सवाल उठाने के साथ-साथ अपने शासन, अपने चुनावी वादों और अपनी उपलब्धियों का हिसाब देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि कांग्रेस देशभर में जवाबदेही की बात कर रही है, तो उसे हिमाचल प्रदेश में भी अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
परमार ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को दिल्ली में अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ खड़े होने के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी याद रखनी चाहिए। प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र और दस गारंटियों पर विश्वास करके उसे सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी थी। आज जनता जानना चाहती है कि उन दस गारंटियों में से कितनी पूरी तरह लागू हुईं, कितनी आंशिक रूप से लागू हुईं और कितनी अभी भी प्रतीक्षा में हैं?
उन्होंने कहा कि पुरानी पेंशन योजना, महिलाओं को 1500 रुपये, युवाओं को रोजगार, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, किसानों-बागवानों के हितों और अन्य चुनावी वादों को लेकर सरकार को स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। केवल घोषणाओं और राजनीतिक भाषणों से जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं। सरकार को प्रत्येक गारंटी की समयसीमा, लाभार्थियों की संख्या और वास्तविक प्रगति का सार्वजनिक ब्यौरा देना चाहिए।
परमार ने चुनावी अनियमितताओं के आरोपों के संदर्भ में 23 अक्टूबर को चार राज्यों में हुए विधान परिषद के शिक्षक एवं स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि मतपत्रों से हुए इन चुनावों के परिणामों पर भी कांग्रेस को तथ्यों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। कर्नाटक की चारों सीटों पर कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने इन चुनावों में अपने प्रत्याशी ही नहीं उतारे थे। ऐसे में अलग-अलग राज्यों के परिणामों को एक ही राजनीतिक निष्कर्ष में समेटने के बजाय निर्वाचन प्रक्रिया और संबंधित दलों की चुनावी स्थिति का तथ्यात्मक विश्लेषण आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को पदभार संभाला था। ऐसे में कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में उसके प्रदर्शन तथा हार के कारणों का आकलन वह किन तथ्यों के आधार पर करती है। हर चुनावी पराजय को निर्वाचन व्यवस्था पर आरोपों से जोड़ देना अपने आप में पर्याप्त तर्क नहीं है।
परमार ने कहा कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी रायबरेली से 3,90,030 मतों के अंतर से विजयी हुए और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने। लोकतंत्र में किसी भी चुनाव परिणाम को स्वीकार करने के साथ-साथ जहां अनियमितता की शिकायत हो, वहां उसका प्रमाण और विधिसम्मत परीक्षण भी जरूरी है। इसलिए आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल रैलियों, नारों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि पारदर्शिता, संस्थाओं के प्रति विश्वास और जनता के प्रति जवाबदेही से होती है। यदि कांग्रेस को चुनावी व्यवस्था में कोई गंभीर अनियमितता दिखाई देती है, तो उसे संबंधित तथ्यों, दस्तावेजों और प्रमाणों के साथ अपनी शिकायतों को उचित संवैधानिक मंच पर प्रस्तुत करना चाहिए।
परमार ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जनता को भी यह जानने का पूरा अधिकार है कि चार वर्षों के शासन में सरकार ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति, बढ़ते कर्ज, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, ग्रामीण विकास और पर्यटन के क्षेत्र में क्या ठोस उपलब्धियां हासिल की हैं। चुनाव के समय किए गए वादों और सत्ता में आने के बाद उनके क्रियान्वयन के बीच कितना अंतर है, इसका जवाब सरकार को देना होगा।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक कार्यक्रमों और राष्ट्रीय अभियानों के बीच हिमाचल के हितों को प्राथमिकता देना मुख्यमंत्री की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। प्रदेश की जनता को केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि कामकाज का प्रमाण, योजनाओं की प्रगति और भविष्य की स्पष्ट कार्ययोजना चाहिए।
लोकतंत्र में सवाल पूछना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उन सवालों का जवाब देना। हिमाचल की जनता भी अपनी सरकार से यही जवाबदेही चाहती है।



