आपदा के जख्म भरने के लिए घोषणाएं नहीं, धरातल पर काम हो: परमार
कहा, क्षतिग्रस्त सड़कों, पेयजल योजनाओं, ग्रामीण संपर्क मार्गों और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की समयबद्ध कार्ययोजना क्या है?
पालमपुर।
हिमाचल प्रदेश में मानसून आपदा से हुए नुकसान, प्रभावित परिवारों की समस्याओं और क्षतिग्रस्त आधारभूत ढांचे की बहाली को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता, प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष एवं सुलह विधानसभा क्षेत्र से विधायक विपिन सिंह परमार ने प्रदेश सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की है। विपिन सिंह परमार ने कहा कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में प्राकृतिक आपदा केवल मकानों, सड़कों और पुलों को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका, बच्चों की शिक्षा, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और किसानों-बागवानों के आर्थिक भविष्य को भी प्रभावित करती है।
परमार ने कहा कि प्रदेश में मानसून से हुए नुकसान का आकलन हजारों करोड़ रुपए में पहुंचना अपने आप में गंभीर विषय है। राज्य सरकार ने केंद्र से 3,525 करोड़ रुपए की सहायता मांगी है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत, पुनर्वास और विकास कार्यों की वर्तमान स्थिति क्या है तथा आगामी सर्दियों से पहले कितने जरूरी कार्य पूरे किए जाएंगे।
विपिन सिंह परमार ने कहा कि आपदा के बाद केवल नुकसान का आंकड़ा प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती उन परिवारों तक सहायता पहुंचाने की है, जिनके मकान क्षतिग्रस्त हुए, जिनकी जमीनें बह गईं, जिनके खेतों में मलबा भर गया और जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी सड़कें टूटने के कारण बाधित हुई। सरकार को प्रभावित परिवारों की स्थिति का पारदर्शी विवरण सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि लोगों को पता चल सके कि राहत के लिए कितने मामले दर्ज हुए, कितनों का सत्यापन हुआ और कितने परिवारों को वास्तविक सहायता मिली।
सड़कें और पुल बहाल करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए
विपिन सिंह परमार ने कहा कि हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था सड़कों पर निर्भर है। सड़क बंद होने का अर्थ केवल यातायात बाधित होना नहीं, बल्कि मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई, किसानों की उपज मंडियों तक पहुंचाने में परेशानी, विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होना और पर्यटन कारोबार को नुकसान पहुंचना भी है।
परमार ने कहा कि लोक निर्माण विभाग और जल शक्ति विभाग सहित संबंधित विभागों को क्षतिग्रस्त सड़कों, पुलों, पेयजल योजनाओं तथा सुरक्षा कार्यों की प्राथमिकता सूची जारी करनी चाहिए। जिन स्थानों पर अस्थायी बहाली हुई है, वहां स्थायी समाधान के लिए तकनीकी आकलन और कार्य पूरा करने की समयसीमा भी सार्वजनिक की जाए।
परमार ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में हर वर्ष बरसात के दौरान एक जैसी समस्याओं का सामने आना इस बात की आवश्यकता दर्शाता है कि आपदा प्रबंधन को केवल तात्कालिक राहत तक सीमित न रखा जाए। संवेदनशील ढलानों का वैज्ञानिक अध्ययन, प्रभावी जल निकासी, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में सुरक्षा उपाय और पुलों-सड़कों की नियमित निगरानी को दीर्घकालीन योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
केंद्र से सहायता की मांग के साथ राज्य सरकार भी बताए अपनी तैयारी
विपिन सिंह परमार ने कहा कि केंद्र सरकार से सहायता मांगना राज्य का अधिकार है, लेकिन प्रदेश सरकार की अपनी जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उपलब्ध संसाधनों से अब तक कितने पुनर्निर्माण कार्य शुरू किए गए हैं, विभागवार कितना बजट खर्च हुआ है और शेष कार्यों को पूरा करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता को आश्वासनों के बजाय समयबद्ध कार्ययोजना चाहिए। आपदा प्रभावित परिवारों को राहत देने, किसानों-बागवानों को हुए नुकसान का आकलन करने तथा आवश्यक सार्वजनिक सुविधाओं को बहाल करने के लिए सरकार को प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय करनी चाहिए।
आपदा से बचाव पर निवेश जरूरी
परमार ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां विशेष हैं। यहां विकास योजनाओं का निर्माण करते समय पर्यावरणीय संवेदनशीलता, स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और प्राकृतिक जल निकासी को गंभीरता से लेना आवश्यक है। सड़क निर्माण, भवन निर्माण और अन्य परियोजनाओं में वैज्ञानिक मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे।
उन्होंने कहा कि आपदा के बाद राहत पहुंचाना आवश्यक है, लेकिन आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए पहले से तैयारी करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। प्रदेश सरकार को संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित आश्रय स्थलों, स्थानीय प्रशासन की तैयारी और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
विपिन सिंह परमार ने मांग की कि प्रदेश सरकार मानसून आपदा से हुए नुकसान, प्राप्त एवं वितरित राहत, लंबित सहायता प्रकरणों तथा पुनर्निर्माण कार्यों की स्थिति पर एक विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। उन्होंने कहा कि प्रभावित लोगों को राहत देना किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का विषय नहीं, बल्कि सरकार का दायित्व है। हिमाचल की जनता को आंकड़ों की घोषणा नहीं, राहत का भरोसा चाहिए; कागजों पर योजनाएं नहीं, धरातल पर परिणाम चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आपदा से प्रभावित कोई भी परिवार जानकारी, प्रक्रिया या प्रशासनिक देरी के कारण अपने अधिकार की सहायता से वंचित न रहे।



